90 छत्रपति शिवाजी
मनहानि की गई। राजा जयसिंह दक्षिण की लड़ाई से लौट कर न आ सके अर्थात् रास्ते ही में मर गये। अब एक और राजपूत वीर की बारी आई कि वह औरंगजेब के हाथ लगे तथा उसके विचारों को पूरा करने का कारण बने। राजा जयसिंह की मृत्यु के बाद शाहजादा आलम को दक्षिण का सूबेदार नियत किया गया। दिलेर खां और खानजहां को खास तौर पर शाहजादे की अधीन शिवाजी के प्रतीकार के लिए नियत किया।
कई एक इतिहासकारों का मत है (औरंगजेब जैसे कपटी मनुष्य के लिए कोई आश्चर्य की बात नहीं है) कि शाहजादा मुअज्जम को अपने पिता से यह आज्ञा मिली थी िकवह दक्षिण में दिखावे मात्र के लिए ही सम्राट् के विरूद्व विद्रोह फैलावे। शिवाजी और अन्य हिन्दू राजाओं को मिलाकर औरंगजेब के हवाले करे। शाहजादा मुअज्जम ने ऐसा ही किया। दक्षिण पहुंचकर शिवाजी से अत्यन्त प्रेमभाव से मिला और कुछ
अधीन करना अत्यन्त आवश्यक है अन्यथा सम्पूर्ण देश निकल जाने का सन्देह है। इस लड़ाई के लिए बीजापुर दरबार ने प्रबन्ध आरम्भ कर दिया। अफजल खां ने (जो बीजापुर दरबार का एक पदाधिकारी था) इस सेना की सिपहसालारी स्वाकार की और चलते समय भरे दरबार में बड़ो अंहकार से यह प्रतिज्ञा की कि मैं बहुत शीध्र इस तुच्छ द्रोही को नंगे पांव दरबार में उपस्थित करूंगा अन्यथा उसका सिर काट लाऊंगा। शिवाजी को जब यह समाचार मिले तो उन्होंने प्रतापगढ़ के दुर्ग में सामना करने की तैयारी की।