लालच दिया। औरंगजेब की ओर से शिवाजी को राजा की पदवी भी दी गई। सभ्माजी का पुरस्कार भी स्थिर कर दिया गया। इसके सिवा बरार में शिवाजी को कई प्रान्तों की जागीर भी दी गई। यहां तक कि पूना चाकन तथा सूपा के प्रान्त भी लौटा दिये गये। शिवाजी ने शाहजादा मुअज्जम से परोक्षतया पत्र व्यवहार से सहायता के लिए प्रतिज्ञा की परन्तु खुले तौर पर उसके पास आने से साफ इन्कार कर दिया।

शिवाजी एक बार मुग़लराज्य के धोखे में अपने प्राण संकट में डाल चके थे। अब यह कभी सम्भव नहीं था कि उन जैसा विचाराशील मनुष्य फिर अपने आप को आपित्त में फंसा देता। परन्तु शाह मुअज्जम की सेवा में अमीर अफसर जिसमें बहुत से हिन्दू भी शामिल थे, इस बनावटी चक्रव्यूह में आ गये जिसका यह फल हुआ कि वे लोग बहुत से छल एंव कपटों के साथ औरंगजेब को सौंप दिये गये। औरंगजेब ने उनमें से कितनों को मुसलमान बना


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अफजल खां ने 5000 सवार तथा 7000 पैदल सेना, तोपखाना व अन्य सांग्रामिक सामग्री साथ लेकर चढ़ाई कर दी।

प्रतापगढ़ किला उन किलों में से है जिन्हें शिवाजी ने स्वयं बनवाया था। प्रतापगढ़ की स्थानिक अवस्था शिवाजी की बुद्विमत्ता तथा विचारशीलता का प्रमाण देती है। दक्षिण के नितान्त सिरे पर यह दुर्ग एक महान् मण्डल को सुदृढ़ करता है। पश्चिम में एक दर्रे के ऊपर है ( जो कि दक्षिण से कोंकण जाने के लिए उचित रास्ता है) उत्तर में सावित्री नदी तथा कृष्णा के स्त्रोत हैं जो दुर्ग से कुछ ही


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