वह सभी को अधीन कर लेते थे- वाणी से वह लोगों के हृदयों को को खींचते थे- प्रेम और स्नेह से वह दूसरे को अपना प्रेमी बना लेते थे। मनुष्यों की वह पूरी पहिचान रखते थे परन्तु गुण की गुण की पहचान करने में तो कमाल ही करते थे। शत्रुओं को मित्र और विश्वसनीय बना लेते थे। बहुत से योग्य, वीर और साहसी मनुष्य उनके साथ रहे, लड़े और इनमें से बहुत से उनकी उच्च बुद्विमत्ता के कायल होकर उनके ऊपर प्राण निछावर करने वाले सिपाही तथा अफसर बने। श्विाजी की सफलता का यही एक मुख्य कारण था। सन् 1667-68 में सुलतान मुअज्जम तथा शिवाजी में घनिष्ठ मित्रता रही। सन् 1668 के मध्य बीजापुर के बादशाह आदिलशाह ने दिल्लीश्वर से सन्धि कर ली और साथ ही शिवाजी से सन्धि करके तीन लाख रूपया वार्षिक कर देना स्वीकार कर लिया। इस प्रकार आदिलशाह ने 5 लाख रूपया वार्षिक स्वीकार कर के सुलह


167 of 229

से मिला कर क्षमा दिला दिया और उसके साथ यह सम्मति की कि किसी प्रकार से अफ़ज़ल खां को एकाकी मिला देवे और यह भ्ज्ञी कहला भेजा कि यदि आप निःसन्देह सच्चे हैं और आपकी भावना में किसी प्रकार का पाप नहीं हैं तो स्वयम् अकेले किले के निकट आ कर मुझ से मिलिए और शपथ खाइये कि आप किसी प्रकार का धोखा मेरे साथ न करेंगे। मुसलमान लेखक लिखते हैं कि ऐसा सन्देश शिवाजी ने ब्राह्यण द्वारा भेजा था और अफ़ज़ल खां ने उसे मान लिया और अकेले उस स्थान पर आया जहां शिवाजी ने मुलाकात


167 of 378