कर ली। सन् 1667 ई. तक शिवाजी अपने राज्य के प्रबन्ध में लगे रहे जिसके कारण लगभग दो वर्ष तक किसी के साथ कोई युद्व नहीं हुआ।
अध्याय 11
मुग़ल सम्राट से मुकाबला-सिंहगढ़ की लड़ाई ताना जी का बलिदान
सन् 1670 ई. में औरंगजेब ने दक्षिण के सूबेदार को दूसरी आज्ञा भेजी कि वह शिवाजी तथा उनके उच्च पदाधिकारियों को गिरफ्तार करे। जिस समय शिवाजी को यह समाचार मिला तो एसी क्षण उन्होंने अपनी ओर से केवल रक्षा ही के लिए नहीं वरन युद्व की तैयारी के लिए भी कमर कस ली। पूर्व इसके कि उनका शत्रु चढ़ाई करे, शिवाजी ने अपने अफसरों को सिंहगढ़ और पूर्णधर किलों को वापस लेने की आज्ञा दे दी। औरंगजेब ने अपने अफसरों से पूछा कि वह कौन सा सिंह है जो इस खोये हुए ’सिंहगढ़’ को शत्रुओं से वापस ले सकता है। गीदड़ों से ’सिंहगढ़’ का खाली करा लेना तो बड़ी बात न थी परन्तु
करने को कहा था। जब अफ़ज़ल खां बगलगीर को बढ़ा तो शिवाजी ने जो सुसज्जित था, अपने जातीय शस्त्र (बिछुवे) से उसका पेट फाड़ डाला और तलवार से काम तमाम कर दिया। अफ़ज़ल खां के साथ जो थोडे़ से मनुष्य साथ आकर कुछ दूरी पर छिपे बैठे थे आ पहुंचे और सम्पूर्ण सेना में कोलाहल मच गया।
जो जो कटुशब्द यथा काफिर, चूहा आदि मुसलमान
छत्रपति शिवाजी 59
लेखकों ने लिख मारा है और जो जो किंवदन्तियां शिवाजी की लल्लो चप्पों तथा चालों की लिखी हैं वे स्वयं इस बात की गवाही