शूरवीरों शेरों को निकाल कर खोये हुए ’सिंहगढ़’ को प्राप्त कर लेना एक असाधारण साहस का काम था। श्री तानाजी के सिवाय और किसी का साहस न हुआ िकइस बीेड़े को उठाये। उसने तलवार हाथ में उठा कर इस सेवा को पूरा करने की आज्ञा मांगी परन्तु शर्त यह थी कि मेरा सगा भाई और एक हजार मावली योद्वा जिनको मैं स्वयं छांट लूं, मुझे दिये जायें।
याद रखना चाहिए कि यह किला बड़े दुर्गम स्थान पर था। पहाड़ों की श्रेणी के पूर्वीय किनारे पर अत्यन्त ऊंचे स्थान पर यह किला बनाया गया थां पूर्व और पश्चिम की ओर तो ऊंची चोटियां थी जहां पर मनुष्यों का आना जाना अत्यन्त कठिन था। यह किला एक ऐसे दृढ़ टीले पर था जिसकी सीधी चढ़ाई आध मील से कम किसी हालत में न
छत्रपति शिवाजी 95
थी। यह टीला पृथ्वीमण्डल पर मानो एक स्थाणु के समान था-आधामील की चढ़ाई के ऊपर चालीस फीट तक काले पत्थर का टीला
देती हैं कि मुसलमान निरिक्षकों की सम्मति पक्षपात शून्य नहीं है। सन्देह की अवस्था में प्रत्येक लेखक ने अपनी ही कल्पना से काम लेकर कोरी कल्पना द्वारा झूठे झूठे चित्र खींचे हैं। यह भी याद रखना चाहिए कि (अंगे्रज लेखक स्टाक साहब ने लिखा है) हिन्दुओं के विषय में साधारणतया तथा मरहठों के विषय में विशेषतया मुसलमान लेखकों के सम्पूर्ण लेख प्रायः ऐसी ही भूलों और पक्षपातों से भर पड़े हैं। स्टाक साहब ने लिखा है कि मुसलमानों के इतिहास के मुकाबले मरहठों के इतिहास अधिक विश्वास करने योग्य