हुआ था। शिवाजी ’रायगढ़’ में थे परन्तु जीजाबाई के दिल में पैदा हुआ था। शिवाजी ’रायगढ़’ में थे परन्तु जीजाबाई ’प्रतापगढ़’ में रहा करती थी। एक दिन महल के ऊपर खड़ी थी कि दूर से सिंहगढ़ किले के बुर्ज दीख पड़े। बस फिर क्या था, दिल में जोश उमड़ आया और सोचने लगी कि जब तक मेरे बेटे के पास यह किला न होगा तब तक राज्य अधुरा ही है। इस विचार को लेकर महल से नीचे उतर आयी और एक दूत को बुला कर शिवाजी के पास पत्र भेजा कि शीघ्र आओ, तुम को माता जी याद करती हैं।
शिवाजी इस आज्ञा को सुनकर तत्काल ’प्रतापगढ़’ पहुंचे। उधर माताजी भी तो पुत्र की प्रतीक्षा कर रही थी’ कि कब शिवाजी आये! इसी बहाने माता जीजाबाई ने सामने चैसर बिछा रक्खा था कि जिसे चैसर खेल रही हैं। इसी बीच शिवाजी आ गये, वरना करते हुए माता के पास पहुंचे। माता ने स्नेहवश उन्हें गोद में
परीक्षा अवश्य करनी चाहिए। अतएव मिलने की स्वीकृति दे दी। फलस्वरूप मिलने के लिए स्थान नियत किया गया। शिवाजी पूर्ण रूप से सुसज्जित हो कर रवाना हुए और अपने पूरोहित ब्राह्यणों को काशी तथा गया आादि स्थानों में पिण्ड देने के निमित्त भेज दिया और स्वयं पूजा भक्ति करके शस्त्र बांधा और भीतर ’सज्जो’ पहिना। उसके ऊपर साधारण सादा ’अंगरखा’ पहिना। इसका अभिप्राय यह था कि शिवाजी हर प्रकार से मरने के लिए उद्यत होकर अपने विश्राम भवन से निकला। जिस समय शिवाजी से बगलगीर होने