का युद्व करा दिया और सम्पूर्ण वीरों का नाश करा दिया उसी चैसर ने इस अवसर पर आज जीजाबाई की सहायता की।

शिवाजी अपनी माता के साथ किले में न पहुंचे। माता तो महल में चली गई और शिवाजी दरबार में जा विराजे। दरबार को आज्ञा दी कि सम्पूर्ण अमीर-सूबेदार शासक तथा मित्रों को जो किले में मौजूद थे, माता जी की आज्ञा सुनाई जाये जिसे सुन कर सब सन्न रह गये। किसी ने इस काम को पूरा करने के लिए बीड़ा नहीं उठाया। अन्त में शिवाजी ने कहा कि कम से कम एक मनुष्य मेरे राज्य में अवश्य है जो कि इस कार्य को पूरा करेगा। दूत को बुलाकर आज्ञा दी, जाओ। और तानाजी को समाचार सुनाओ कि शिवाजी ने तुम्हें याद किया हैं आज के चैथे दिन तक तानाजी अवश्य यहां पहुंच जावें।

यह वही तानाजी हैं जो अफजलखां की घटना के समय शिवाजी के साथ में था। शिवाजी की आज्ञा पाते ही दूत तुरन्त रवाना हो गया और


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शिवा जी कट्टर हिन्दू है और उन्हें अपने धर्म की मानहानि तथा देवताओं के अनादर से अत्यन्त दुःख होता है। ईश्वर ने उसमें बदला लेने की शक्ति कूट-कूट कर भर दी है तो फिर हम किस प्रकार से यह निश्चय कर लें कि अफ़ज़ल खां एक साधारण मनुष्य था । जो इन घटनाओं के होते हूए भी बिना किसी प्रकार की दुष्ट भावना के अकेले ही एक प्रसिद्व नरशेर की कन्दरा में जा घुसा। यदि हम विचारार्थ यह भी मान लें कि ऐसी घटना हुई और शिवाजी ने धोखे से अफ़ज़ल खा को कत्ल किया तो भी कुछ आश्चर्य


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