तानाजी की जागीर में जा पहुंचा। क्या देखा कि चारों तरफ आनन्द और प्रसन्नता के दृश्य दिखलाई पड़ रहे हैं। पूछने पर ज्ञात हुआ कि तानाजी के पुत्र ’रायबा’ के यज्ञोपवीत तथा विवाह संस्कार की तैयारियां हो रही हैं। दूत ने सम्पूर्ण बन्धुओं तथा सेनाध्यक्षों के सामने तानाजी को शिवाजी का पत्र दिया। जिस समय तानाजी ने शिवाजी का पत्र पढ़ा तो तानाजी का चचा शेलरजी इस प्रकार बोल उठा। तानाजी! सिंहगढ़ का विजय करना सुगम नहीं है, जितने भी मनुष्य उस किले पर चढ़ कर गये कोई जीवित नहीं बचा। मुझे अच्छा नहीं मालूम होता है कि तुम अपने पुत्र के विवाहोत्सव को त्याग
छत्रपति शिवाजी 99
कर इस युद्व में जाओ। मेरा मस्तक ठनक रहा है तुम जीते जी युद्व से वापस नहीं आ सकोगे।तानाजी-चाचाजी! आप यह क्या कहते हैं? क्या मैं क्षत्रिय नहीं हूं। क्या मैंने क्षत्राणी का दूध नहीं पिया जो आप मुझे इस तरह मौत से डराते हैं।
की बात नहीं, क्योंकि उस समय में शत्रु को इस प्रकार से मार लेना बुरा नहीं माना जाता था। औरंगजेब ने इसी प्रकार के व्यवहारों से दिल्ली के राज्यसिंहासन पर अधिकार जमाया था। इस घटना से कुछ दिन पूर्व बीजापुर का राज्यमन्त्री ’आजम खां’ भी इसी प्रकार मारा गया था और उसका पुत्र ’खवास खां’ भी पीछे से इसी प्रकार से मरा। स्वयं औरंगजेब ने इसी भाव से शिवाजी को दिल्ली में बन्दी किया था। भावार्थ यह कि भारत का इतिहास ऐसी घटनाओं से भरा पड़ा है। मुसलमानों ने युद्वशासन के अनुसार इस