जिस समय तानाजी इस प्रकार कह रहे थे उस समय उनका इकलौता पुत्र सामने आ पहुंचा। उसने पुत्र को पास बुलाकर और धैर्य देकर कहा कि मैं राजा शिवाजी की सेवा में जाता हूं और सात दिन का अवकाश लेकर तेरे विवाह के लिए लौट आऊंगा। तत्पश्चात् पुनः युद्व में चला जाऊंगा। तानाजी, शिवाजी की आज्ञा पालन करने के लिए अपने मण्डल की सम्पूर्ण लड़ने वाली जातियों को एकत्र करके रायगढ़ की ओर चल दिया।
इस विषय में एक कवि ने लिखा है कि यह बारह हजार की सेना के लोग पूरे बनवासी थे जो अपने अपने कम्बल कन्धों पर रख कर तथा अपने अपने खेत छोड़कर तानाजी के चारों ओर जमा हो गये थे। न तो उनके पास में वस्त्र थे न अस्त्र थे। किन्तु उनकी लाठियां ही उनके लिए शस्त्र थी। जब गांव से निकले तो शकुन बहुत बुरे दिखाई देने गले। वृद्व जी को संदेह हो गया, इसलिए तानाजी से कहने लगा कि शकुन
प्रकार शत्रु को मारना पाप नहीं समझा। जैसा वर्तमान समय में समझा जाता है। राजपूतों का युद्वशासन तो अपनी पवित्रता, पुरूषार्थता और वीरता में सब जातियों से उच्च है। धोखा तथा दगा तो क्या! राजपूतों ने घिरे हुए शत्रु को मारना भी वीरता से बाहर समझाा अन्यथा उन्हें कई बार अवसर मिल चुके थे कि वे भारतवर्ष से यवनराज्य का नामोनिशान मिटा देते।
62 छत्रपति शिवाजी
अफ़ज़ल खां के मरते ही सम्पूर्ण सेना में खलबली मच गई और मराठों ने शत्रु रक्त में हाथ रंगने शुरू कर दिये। सम्पूर्ण