तो ठीक नहीं है। लौट चलो, परन्तु वीर तानाजी ने कहा कि चाचा जी! मैं शकुन वकुन कुछ नहीं जानता, मेरा राजा भाग्य का बड़ा धनी है। उसक काम में कोई मन्द शकुन हो ही नहीं सकता है। आप पीछे लौटने का नाम न लें, सीधे मार्ग पर आ जायें।

अपनी सेना को साथ ले तानाजी यात्रा करता हुआ रायगढ़ के किले के सामने जा पहुंचा। दूर से जीजाबाई ने देखा तो उनके मन में यह विचार पैदा हो गया कि शायद कोई शत्रु चढ़ आया है। यह सोच कर जल्द शिवाजी को बुला भेजा और सामना करने के लिए आज्ञा दी। जब शिवाजी ने ध्यान देकर देखा तो ज्ञात हुआ कि यह शत्रु नहीं बल्कि

100 छत्रपति शिवाजी

मित्र है। माताजी को समझाया कि तानाजी अपनी सारी शक्ति को द्वार पर छोड़ स्वयं किले के अन्दर आ पहुंचा है।

यह बात हो ही रही थी कि तानाजी शिवाजी के सम्मुख आ उपस्थित हुआ और वन्दनादि शिष्टाचार के बाद बोला-हे


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इतिहासकार इस बात से सहमत हैं कि शिवाजी इस प्रकार के कर्म से सदा अप्रसन्नता प्रकट करता था और आज्ञाएं निकाल रक्खी थी कि यथासम्भव किसी के साथ अनावश्यक युद्व न छेड़ा जाये। शिवाजी कैदियों के साथ सदैव अत्यन्त क ृपा तथा दया का बर्ताव करता था। इस अवसर पर जितने शत्रु के सैनिक कैद कर लिऐ गये उनके साथ भी शिवाजी अत्यन्त अनुग्रह और दया से पेश आता था। बहुत से लोगों ने इसी अनुग्रह के कारण इसकी नौकरी स्वीकार की थी। ’भूभराय घाटमी’ एक बड़ा मान्य मरहठा था जो


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