मौजुद है। यह मराठा जाति है। मेरा विश्वास है कि इस प्रकार का इतिहास भारत के अनेक प्रान्तों की हिन्दू जातियों के पास भी है जिससे उन्हें अपनी अवनति के कारणों का बोध होता है। यदि सब को एकत्र किया जाये तो हमारी इस विशाल जाति की गिरावट का इतिहास जानने का पर्याप्त मसाला मिल जायेगा। प्रायः देखा जाता है कि जिसके जी में जो आता है वह हिन्दुओं को डरपोक व कायर कहने में कोई संकोच नहीं करता। अंगे्रज या मुसलमान ऐसा कहें तो उसका कुछ कारण हो सकता है किन्तू आश्चर्य इस बात का है कि खुद हिन्दू जाति को अपनी भीरूता का कुछ ऐसा ही विश्वास हो गया है कि वह इससे भिन्न कुछ मानने को तैयार ही नहीं। सबसे पहले तो हमारे मदरसों में मुल्लाओं ने, इसके बाद स्कूलों के मास्टरों ने और फिर आगे कालेजों में अंगे्रजी ने हमें यही पढ़ाया कि हमारी जाति की कायरता का कारण हमारे दार्शनिक विचार हैं। किन्तू सूक्ष्मदर्शिता और कायरता को


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10 छत्रपति शिवाजी

ध्यान कम गया है। पाश्चात्य विद्वानों के भी दो प्रकार के लेख मिलते हैं। प्रथम कोटि में वे लोग हैं जिन्होंने पक्षपातरहित होकर लिखा है, यद्यपि इनकी संख्या कम है। इन लोगों में भी वे लोग और भी कम हैं जो हमारी जाति के प्रति सहानुभूति रखकर लिख सके हैं। खेद इस बात का है कि इस कोटि के ग्रन्थों तक हमारे विद्यार्थियों की पहुंच बहुत कम है। आज जो इतिहास पढ़ाये जाते हैं वे इतने विचित्र हैं कि उनके सिर, पैर का कुछ पता नहीं लगता। जिन स्वदेशी विद्वानों ने हमारे


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