राजन्! मैंने कौन सा अपराध किया है जो मुझे ऐसे समय में बुलाया गया जब कि मैं पुत्र का विवाह करने में संलग्न था। क्या कारण है जो मुझ से ऐसी कड़ाई से काम लिया गया। शिवाजी ने कहा-तानाजी, मैंने तुम्हें नहीं बुलाया किन्तु माताजी ने तुम्हें याद किया है। उधर माताजी बैठी हुई सब बातें सुन रही थी। चकित हो गई कि शिवाजी ने अपने ऊपर की जिम्मेदारी मेरे ऊपर टाल दी। देखें मुझे कैसे सफलता प्राप्त होती है। तत्काल अपने महल में चली गई और चांदी के एक थाल में दीपक जलाकर ले आई। इतने में तानाजी भी आ पहुंचां माता जी ने थाली तानाजी के शिर के ऊपर घुमा कर खुले मस्तक हो आर्शीवाद दिया, बेटा! चिरन्जीव रहो, तानाजी ने पगड़ी उतार कर माताजी के पैरों पर रख दी और बोला- जो आज्ञा हो उसको पूरा करने के लिए सेवक उपस्थित है। जीजाबाई ने कहा कि ऐ मेरे सरदार! बुढ़ापे में एक यही अभिलाषा रह


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किसी समय शिवाजी के पिता शाहजी का परम मित्र था शिवाजी उसे इस बात पर उद्यत न कर सका कि वह बीजापुर की पौकरी छोड़ कर शिवाजी की नौकरी करे फिर भी शिवाजी ने उसको बहुत सा पुरस्कार देकर विदा किया था। अपनी सेना के चोट खाये हुए वीरों को उन्होंने बहुत सी बहुमूल्य वस्तुएं ( सोने के हार तथा चांदी की जंजीरें ) उपहार में दी थीं साधारण रीति से वह अपनी सेना को प्रसन्न रखने का प्रयत्न करता था जिससे उनका उत्साह दिन प्रतिदिन द्विगुणित होता रहता था अफ़ज़ल खां की तलवार


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