गई है कि सिंहगढ़ को विजय किया जाए, क्यांेकि शिवाजी और तानाजी जेसे की माता कहा कर भी यदि यह किला हाथ न आया तो मृत्युपर्यन्त शोक बना रहेगा। तानाजी यह शब्द सुनते ही अपने स्थान पर लौट आया। चाचा शेलर जी ने पूछा कि कहो कैसी गुजरी? तानाजी ने उत्तर दिया कि चाचाजी क्या कहूं, माताजी विजयी हुई और मैं हार गया। अब तो मैं सीधा सिंहगढ़ जाता हूं। शेलर ने जवाब दिया, बहुत अच्छा बेटा, जाओ। जाने के पहले आओ मिल कर भोजन तो कर लें। एक कवि ने यह वृत्तान्त इस तरह लिखा है कि शिवाजी की माता ने स्वयम् अपने सामने सम्पूर्ण सेना को भोजन कराया और तानाजी को पुरस्कार देकर सिंहगढ़ के लिए विदा किया।
101 छत्रपति शिवाजी
इस गीत के अनुसार जैसा कवि ने लिखा है कि बारह अजार सिपाही तानाजी के साथ थे परन्तु इतिहासकारों ने केवल एक हजार का ही वर्णन किया है और यह ठीक प्रतीत होता है।
अब तक शिवाजी के वंशधरों (जो कोल्हापुर में राज करते हैं) के पास है। इस घटना से शिवाजी की शक्ति और भी बढ़ गई और थोड़े ही समय में अन्य कई किलों पर भी उनका अधिकार हो गया। बीजापुर के दरबार ने अफ़ज़ल खां की मौत का समाचार पाकर ’रूस्तनेज खां’ को आज्ञा दी िकवह कोल्हापुर को बचाने के लिए सेना लेकर जाये परन्तु शिवाजी ने उसे भी आक्रमण करके परास्त कर दिया। इसके पश्चात् शिवाजी ने सीधा राजपुर (जहां अंगे्रजों की बस्ती थी) का मार्ग लिया और वहां से ’कर’ तथा ’भेंट’ लेता हुआ ’बहिल’ पर अधिकार जमा लिया। वहां से उन्हें