डाल कर कहा कि कोई क्षत्रिय का बेटा है तो बीड़ा उठावे और रस्सी के ऊपर चढ़े। सब के सब इधर उधर ताकने लगे। किसी का साहस न हुआ कि पान का बीड़ा उठा सके। यह देख तानाजी को क्रोध के नेत्र लाल हो गये। बोल उठा-उठ खड़े होओ, अपने अपने शस्त्र उतार कर रख दो और स्त्रियों के लहंगे पहिन कर घर का रास्ता लो। बस इतना कहना था कि मरहठों के नेत्रों में खून उतर आया। सब के सब आगे बढ़ने लगे। अन्त को तानाजी ने 500 आदमी चुन लिया और सबों ने एक हो ऊपर चढ़ना आरम्भ कर दिया यहां तक कि रस्सी टूट गई,
102 छत्रपति शिवाजी
और सब के सब पृथ्वी पर गिर पड़े। जब तानाजी को यह समाचार मिला तो उन्हें अत्यन्त खेद हुआ और कहने लगे कि केवल रस्सी ही नहीं टूटी प्रत्युत सच पूछो तो हमारे जीवन की लड़ी समाप्त हो गई। चाचा शेलरजी को सम्बोधन कर कहने लगे।
चाचाजी!
हो लिया (दोनों को आज्ञा मिली कि ’पलाना’ किला) (जो अभी थोड़े दिन पहले शिवाजी ने प्राप्त किया था) उस पर आक्रमण करें। देसरी तरफ से फतेहखां को आज्ञा दी गई । ’सीदी जौहर’ को सलावतखां की पदवी दी गई। शिवाजी ने भी युद्व की तैयारी आरम्भ कर दी और ’रघुननाथपन्त’ को आज्ञा दी कि फतेहखां का सामना करे तथा ’आबाजी सोनदेव’ कल्याण भभेरी के किले पर तैनात किये गये। ’भाऊजी पालकर’ को आज्ञा मिली िकवे बारी के सामन्त लोगों का सामना करे। पूर्णधर, संगर व प्रतापगढ़ और आस