तानाजी-अरे मूर्ख ! क्यों अपने को बाप दादा के नाम पर बट्टा लगाता है; जा, और खेत से सन काट ले आ। उसके बोरे बनाकर अपनी औरत को दे और कह कि बेच कर कुछ धान खरीद लावे और धान के छिलके की रोटी बनावे और चावलों को बाजार में बेच आये। जाओ, तलवार रख दो क्यांेकि तुम्हें इसे पकड़ने तक की बुद्वि नहीं है।

इस प्रकार की वंशपरम्परा का वर्णन करके दोनों वीर सामने हुए। पठान उन्मत्त हाथी पर सवार था और मराठा वीर तानाजी घोड़े पर था। सब से पहला वार पठान ने बड़े जोर से किया जो पत्थर को चीरता हुआ पार निकल गया परन्तु वह भी खाली गया। पठान ने फिर दूसरी बार वार किया परन्तु वह भी खाली गया। अन्त में तानाजी घोड़े से उछला और हाथी के समीप आकर उसकी सूंड पर ऐसा वार किया और हाथी के समीप आकर उसकी सूंड पर ऐसा वार किया कि हाथी घायल होकर पृथ्वी


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करना (भाई भी कैसे जो धर्म युद्व करने तथा निर्दयी शत्रुओं के हाथों से अपनी भूमि छुड़ाना चाहते थे) महापाप है। दुर्भाग्य ! भारतवर्ष के इसी भीतरी संग्राम ने ’तरावड़ी’ के मैदान में भारतवर्ष से हिन्दू राज्यों की समाप्ति कर दी। इसी भीतरी संग्राम ने पीछे कई आक्रमणकारी मुसलमानों को भारत को लूटने का अवसर दिया। इसी भीतरी संग्राम ने हिन्दुओं को जातीय अवस्था से अलग कर दिया। इसी भीतरी संग्राम ने मरहठों की अवनति की। इसी ने शिवाजी के हाथ से लगाये हुए पौधों को समूल नष्ट कर दिया।


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