पर गिर पड़ा। साथ ही पठान भी गिर कर स्वर्गलोक को चला गया इस प्रकार उदयभानु के सब अफसर और बेटे बारी बारी से मारे गये। जब उदयभानु ने देखा कि इस प्रकार कुछ काम नहीं बनता है तो किले में रक्खी तमाम रूई और तेल में आग लगा दी। प्रकाश होने पर उदयभानु को पता लगा कि तानाजी की सेना बहुत थोड़ी है। बस फिर क्या था? शेर के समान गरजा और तानाजी के सामने आ डटा और तानाजी की तारीफ कर के उसे फुसलाने लगा। तानाजी भी उसके प्रश्न का यथोचित उत्तर देते रहे। वह नमकहराम न था कि उदयभानु के फुसलाने से युद्व से विमुख हो जाता।
तानाजी ने कहा, यदि लड़ाई का साहस नहीं हो तो
104 छत्रपति शिवाजी
शस्त्र छोड़ो और गले में पगड़ी डाल कर मेरे साथ चलो। मैं प्रतिज्ञा करता हूं कि शिवाजी तुमसे अच्छी तरह से पेश आयेंगे। परन्तु उदयभानु ने अपने घमण्ड के वशीभूत हो
इसी पारस्परिक संग्राम ने सिखों का नाश किया तथा अब भी यही परस्पर का संग्राम हिन्दुओं की उन्नति तथा पारस्परिक प्रेम में बाधक है। बहुत अच्छा होता यदि कोई दैवी आकाश वाणी होती और इन लोगों को पारस्परिक युद्व की हानियां समझा कर रोकती।
शिवाजी को जब समाचार मिला तो उसने समझा कि मैंने बड़ी भारी भूल की जो इस प्रकार किले में घिर कर बैठ गया। घेरे को चार महीने हो गये यद्यपिइ इस समय तक शत्रु को आक्रमण करने का कोई अवसर नहीं मिला तथापि शत्रु तब भी डटा रहा और