उस पर कुछ ध्यान न देकर अपनी तलवार का वार तानाजी पर किया बस फिर क्या था! बत की बात में दोनों के वार होने लगे। बहुत बड़ी लड़ाई के बाद मैदान में तानाजी मारा गया।
तनाजी को मार कर उदयभानु यह सोचकर पीछे हटना ही चाहता था कि बस शेर तो मार लिया, बाकी ब ची सेना को अन्य लोग खपा देंगे, इतने में तानाजी का चाचा शेलरजी ललकारता हुआ तानाजी की तलवार लेकर आगे बढ़ा और बोला कि कहां जाता है! तानाजी मर गया तो क्या सारा महाराष्ट्र मर गया? जरा सामने तो आ ओर देख कि मरे हुए सरदार की तलवार क्या काम करती है।
ठतना कहते हुए उदयभानु पर झपट पड़ा। फलस्वरूप उस युद्व में उदयभानु शेलरजी के हाथों मारा गया। राजपूतों की सारी सेना एकत्रित होकर तानाजी की सेना पर टूट पड़ी। इतने में तानाजी का भाई ’सवायजी’ किसी प्रकार से अपने साथियों समेत किले में घुस
सचेत रहा। अन्त को शिवाजी ने एक नई चाल अर्थात् सन्धि के लिए बातचीत चलाई। दोनों ओर से लड़ाई बन्द कर दी गई। अभी पूर्ण रूप से मिलाप होने न पाया था और सम्पूर्ण नियम भी निश्चित नहीं हुए थे कि रात को शिवाजी ने कुछ साथी लेकर किले से निकल कर पर्वतों से होते हुए जंगलों का रास्ता लिया। शिवाजी पूर्ण उत्तेजना से
छत्रपति शिवाजी 65
’अगना’ की ओर प्रस्थान कर रहे थे पर विरोधियों को यह हाल मालूम हो गया कि शिवाजी किले से निकल भागे। तत्काल ही फ़ाजिल मुहम्मद खां और