गया और हर हर महादेव की ध्वनि से मराठों का खून उबल पड़ा। फिर क्या था? मरहठे खूब डट कर लड़े और अन्त को उन्हीं की विजय हुई। बचे खुचे राजपूत किला छोड़ कर भाग निकले। किले पर अधिकार करते ही मरहठों ने किले की छत पर से तोपें चलाई जिससे कि शिवाजी किला मिल जाने की सूचना पर सकें। परन्तु जिस समय ’शिवाजी’ ने सुना कि तानाजी मारा गया तो अत्यन्त शोक में होकर कहने लगे कि तानाजी मारा गया तो अत्यन्त शोक में होकर कहने लगे कि हा शोक! सिंहगढ़’ तो हाथ आया परन्तु ’सिंह’ हाथ से जाता रहा।

शिवाजी ने इस विजय के उपलक्ष्य में अपनी प्रथा के विरूद्व सम्पूर्ण सिपाहियों को चांदी के पुरस्कार दिये। ’सवायजी’ को इस किले का अध्यक्ष नियत किया। उन्होंने एक मास के अन्दर ’पूर्णधर’ किले को विजय कर लिया।

छत्रपति शिवाजी 105

यह कार्यवाही मार्च सन् 1667 ई. में हुई।


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सीदीजौहर का पुत्र सैदी अजीज पीछा करने के लिए रवाना किये गये। परन्तु शिवाजी ने इसके पहले पूरा प्रबन्ध कर दिया था। अर्थात् इस आपत्ति को हटाने के लिए अपने ’मावली’ साथियों का एक समूह मार्ग में छोड़ दिया था जिसका प्रबन्ध बाजीराव देशपाण्डे के आधीन था। जब पीछा करने वाले मुसलमान आ पहंुचे तो उनके साथ सेना बहुत अधिक थी तथा मरहठे संख्या में बहुत कम थे। शिवाजी ने आज्ञा दी थी कि जब तक (हमारी ओर से) पांच गोलियां न चलें तब तक लड़ते रहना और अमुक दिशा में


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