उधर कोंकण नामक स्थान में ’म्हाली’ किले के घेरे में मुरारपन्त को बहुत हानि उठानी पड़ी परन्तु अन्त में दो मास के पश्चात् किला हाथ आ गया। वर्षाकाल समाप्त होते ही ता. 3 अक्टूबर सन् 1670 को शिवाजी ने 1500 सिपाहियों के साथ सूरत पर चढ़ाई कर दी और तीन दिन तक लूटते रहे। तीन दिन के पश्चात् वह अपनी सेना को लेकर ’सहारा’ के रास्ते अपने इलाके में लौट आये और चलते समय शहर वालों को एक विज्ञापन दे गये कि यदि तुम इस लूट से बचना चाहते हो तो 1200000 (बारह लाख) रूपया वार्षिक देना स्वीकार करो।

’शिवाजी’ अभी रास्ते में ही थे, उन्हें पता लगा कि दाऊद खां 5000 हजार सेना लेकर पीछा करता आ रहा है। जिस मार्ग से होकर शिवाजी नासिक के पार जाना चाहते थे उस मार्ग से होकर शिवाजी नासिक के पार जाना चाहते थे उस मार्ग में दाऊद खां की सेना बीच में आ गई।

शिवाजी


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लगातार पांच गोलियां चल जाये तो समझ लेना कि हम सुख से किले से पहंुच गये। देशपाण्डे और वे मावली अत्यन्त वीरता से लड़ते रहे, आधे के लगभग मारे गये परन्तू फिर भी शत्रु को रास्ता नहीं दिया। यहां तक कि देशपाण्डे भी लड़ते लड़ते मारे गये। यह अभी जमीन पर गिरे भी न थे कि गोलियों का शब्द सुनाई दिया। देशपाण्डे ने समझा कि शिवाजी सकुशल किले में पहंुच गये इस प्रकार खुशी से उन्होंने अपने प्राण त्याग दिये। अन्य साथियों ने देशपाण्डे की लाश को उठाकर अगणित शत्रुओं को हताश छोड़


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