शिवाजी को दिया करेंगे जिसके बदले शिवाजी की ओर से उनकी रक्षा करने की प्रतिज्ञा की गई। इस प्रकार मुग़लों का सूबा खानदेश भी शिवाजी की अधीनता में आ गया। उधर जब औरंगजेब को यह समाचार मिला तो उसने राजा जसवन्तसिंह को लौटने की आज्ञा दे 40000 सेना के साथ महावतखां को शिवाजी का सामना करने के लिए भेजा। औरंगजेब को शंका थी कि सुल्तान मुअज्जम शिवाजी से मेल रखता है और इसमें कुछ भी सन्देह नहीं कि यदि सचमुच यह बात शिवाजी और जसवन्तसिंह जी के मध्य थी तभी जसवन्तसिंह ने शिवाजी को कष्ट देने के लिए उत्साह नहीं दिखाया।
महावतखां ने दक्षिण पहुंचकर तुरन्त किलों को घेरना आरम्भ कर दिया परन्तु सन् 1662 ई. की वर्षाऋतु तक ’औंडा’ और ’पटा’ नाम के दो ही किले वापस ले सका। अन्त में सेना के दो भाग कर दिये। एक ने दिलेरखां के आज्ञानुसार ’चाकन’ पर धावा किया और दूसरे
का किला पावनगढ़, आंगन और विशालगढ़ तथा आसपास के किले जो शिवाजी ने ले लिये थे बादशाह के
66 छत्रपति शिवाजी
हाथ आ गये। इतने में वर्षा आरम्भ हो गई। बादशाह ने कृष्णा नदी के किनारे ’’चमलगे’’ स्थान पर अपना खेमा जमा दिया। शिवाजी ने यद्यपि बादशाह का सामना नहीं किया परन्तु फिर भी वह चुपचाप नहीं रहा। वर्षा के प्रारम्भ में वह ’राजापुर’ के सामने जा उपस्थित हुआ और उसने उस नगर को लूटा। इस अवसर पर अंगे्रजो की भी कुछ हानि हुई और कई एक बड़े