कर मर गये। कई सरदार घायल हुए और पकड़े गये। इस बड़ी विजय का फल यह हुआ कि मुग़ल सेना, ’सह्यरा’

छत्रपति शिवाजी 107

को छोड़कर औरंगाबाद की ओर हट गई। इस वर्षाऋतु में शिवाजी छोटी छोटी लड़ाइयां लड़ते रहे ताकि सम्पूर्ण दक्षिण प्रान्त में एक राज्य हो जाय। पुर्तगाल वालों से भी कई बार थोड़ी भिड़न्त हुई जिसमें किसी पक्ष की अधिक हानि नहीं हुई।

अंग्रेज भी इस अवसर पर प्रतिज्ञा विषयक पत्र-व्यवहार करते रहे। उधर मुग़ल सम्राट् औरंगजेब ने जब यह समाचार सुना कि इखलासखां हार गया तो महावतखां और खानमुअज्जम को दक्षिण का सूबेदार नियत कर दिया। खानजहां ने यह उचित समझा कि मरहठों पर हमले न किये जायं। किन्तु घाटों और मार्गाें को रोक कर उन्हें तंग किया जाय। अतएव उसने ’बहादुरगढ़’ नाम का किला बनवाया परन्तु उसे यह कब मालूम था कि मरहठे घाटों और


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यवनों के नष्ट होने से लाभ उठायेगी और सिंहासन पर अपना आधिपत्य जमा लेगी। राजापुर से निकल कर शिवाजी ने एक हिन्दू राजा ’दलवी’ की उपजाऊ भूमि पर आक्रमण किया और उसकी राजधानी ’सुरंगापुर’ पर अधिकार जमा लिया। ’दलवी’ की हिन्दू प्रजा ने शिवाजी की इस करतूत को पसन्द न किया और राज्य छोड़ कर जाने लगे। शिवाजी ने एक प्रसिद्व और उच्चवंशीय ’सरदवे’ नाम के सरदार को समझा बुझा कर वापस बुलाया जिसके साथ बहुत सी हिन्दू प्रजा भी लौट आई। उसी वर्ष वर्षा ऋतु में


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