इसमें बहुत हानि उठानी पड़ी। एक बार पहले भी वे राजापुर के स्थान पर लूटे जा चुके थे। अब दूसरी बार हुगली में जा कर लूटे गये।
शिवाजी ने अपने समुद्री बेड़े को लेकर बीजापुर के उस भाग को तंग करना प्रारम्भ कर दिया जो समुद्र के तट
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पर था। भीतर के भाग में देशमुखों को राजद्रोह के लिए तैयार कर मुसलमानी थाने उठवा दिये। राजा बदनूर ने भी हुगली की लूट से भयभीत होकर शिवाजी का साथ देना स्वीकार किया। मई मास में सेना के एक भाग ने ’परली’ के किले को विजय किया और सितम्बर के आरम्भ में ’सतारा’ प्राप्त कर लिया। और सितम्बर के आरम्भ में ’सतारा’ प्राप्त कर लिया। बाद को ’चन्दनपडूगढ़’ तथा ’नन्दीगढ़’ आदि किले भी फतह कर लिये। प्रतापराव ने अब्दुलकरीम को जो बीजापुर का अध्यक्ष था इतना सताया कि उसे सन्धि की थी उन्हें शिवाजी ने पसन्द न किया और प्रतापराव से शिवाजी अप्रसन्न हो गये।
हो जाने के कारण अन्त में बादशाह स्वयं रणक्षेत्र में उतरा तो ’सीदीजौहर’ ने क्षमा मांगी। यद्यपित ब भी ’सीदीजौहर’ के दिल में ऐसा भय समाया हुआ था कि बादशाह के सामने आने की हिम्मत न पड़ी और वन्दन शिष्टाचार करके चला गया। जब बादशाह कृष्णा नदी के तट पर ठहरा हुआ था तो उसने सन्देश भेज कर सीदीजौहर को बुलाया। यद्यपि ’सीदीजौहर’ आया और वन्दन शिष्टाचार करके चला गया परन्तु इब्राहिम खां को जो बादशाह का मन्त्री था (और शीदीजौहर का कट्टर शत्रु था) खटका ही लगा रहा।