प्रतापराव इस अप्रसन्नता के कारण ’बरापांघाट’ के प्रान्त में चला गया जिससे फिर अब्दुलकरीम को साहस हो आया और उसने बहुत सी सेना इकट्ठी करके पनाला को फिर से विजय करना चाहा। फरवरी सन् 1643 में यह धावा प्रारम्भ हुआ। अब्दुलकरीम की सेना किले के पास पहुंची ही थी कि प्रतापराव अपनी सेना सहित उधर से आ निकला। मालूम होने पर शिवाजी ने प्रतापराव को लिख भेजा कि जब तक तू मुसलमानी सेना का विध्वंस करके बहुत सा धन लूट नहीं लावेगा तब तक मैं तेरा मुंह नहीं देखना चाहता। प्रतापराव ने इस अनादर को दूर करने के लिए एक महती सेना के साथ बीजापुर पर चढ़ाई कर दी। यद्यपि प्रतापराव बड़ी वीरता से लड़ा परन्तु युद्व में मारा गया और उसकी सेना हताश होकर भागने लगी। मुसलमानों ने समझा कि मरहठी सेना समाप्त हो चुकी है अतएव उन्होंने पीछा करना शुरू किया। इतने में ’मुशाहजी’
इसी समय कर्णाटक में गड़बड़ हो गई और कुछ विद्रोही तैयार हो गये। बादशाह स्वयं शिवाजी के पीछे जाना चाहता था परन्तु जब सीदीजौहर की ओर से उन विद्रोहियों को दबाने की रूचि न पाई गई तो बादशाह को ’सीदी’ पर सन्देह हुआ कि यह भीतर ही भीतर शिवाजी से मिल गया है। तब भी बादशाह मन्त्रियों से सलाह लेकर शिवाजी पर चढ़ाई करने के बजाय कर्णाटक पर अधिकार करने के लिए आगे बढ़ा। ’बहलाले खां’ और बाजीघोरपड़े किसी काम से अपनी जागीर में गये हुए थे। बाजीघोरपड़े