पांच हजार सिपाही लेकर आ पहुंचा और मुसलमानी सेना जो पीछा कर रही थी अपने प्राण बचा कर भाग निकली। बेचारे अब्दुलकरीम को जीती हुई बाजी हारनी पड़ी। फलस्वरूप अपना सा मंुह लेकर वह बीजापुर वापस चल दिया।
छत्रपति शिवाजी 109
शिवाजी को जब प्रतापराव की मृत्यु का समाचार मिला तो उन्हें अत्यन्त खेद हुआ। उसके बेटे को बहुत सी जागीर दी गई और उसकी बेटी से अपने बेटे के साथ विवाह करके राजवंश से सम्बन्ध कर दिया। मुशाहजी के काम से शिवाजी अत्यन्त प्रसन्न हुए और उसे ’हेमराव’ की पदवी देकर अपना सरदार बनाया। इस प्रकार भारत का प्रायः सम्पूर्ण दक्षिणी भाग अपने अधीन करके शिवाजी ने एक बहुत बड़ा यज्ञ आरम्भ किया और जून 1674 ई. (अर्थात् 13 ज्येष्ठ सं. 1731 वि.) को गद्दी पर बैठे।
शिवाजी अपना सिक्का तो पहले ही चला चुके थे अब अपने नाम का संवत् भी उन्होंने
ने शिवाजी के पिता को छल करके कैद किया था और बीजापुर भेज दिया था। शिवाजी सदैव इसी चिन्ता में रहा करते कि किसी तरह से ’बाजी’ से बदला लें। अवसर अच्छा पाकर शिवाजी ने तुरन्त ’बाजी’ पर चढ़ाई कर दी और सम्बन्धियों सहित उसे हनन कर डाला तथा ’मौधल’ को लूट कर तुरन्त विशालगढ़ वापस आ गये। राजदरबार की ओर से ’खवासखां’ शिवाजी को दबाने के लिए नियत किया गया परन्तु थोड़ी देर बाद सम्पूर्ण सेना (जो शिवाजी का सामना करने के लिए नियत की गई थी) वापस बुला ली गई और बीजापुर के बादशाह ने शिवाजी के पिता से