उनकी पहली प्राथमिकता थी। स्वदेश के इतिहास का अध्ययन भी उन्होंने गम्भीरता पूर्वक किया था और इस विषय से सम्बन्धित अनेक स्वदेशी एवं विदेशी लेखकों के ग्रन्थों को पढ़ा था। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम दशक में उनकी महापुरूषों के विशद जीवनचरित लिखे। योगिराज कृष्ण, छत्रपति शिवाजी, सम्राट् अशोक, महर्षि दयानन्द तथा अपने सहपाठी एंव वैदिक विद्वान पं. गुरूदत्त विद्यार्थी के प्रामाणिक जीवनचरित लिखने के साथ साथ उन्होंने इटली को स्वाधीनता दिलाने वाले ग्वीसेप मैजिनी तथा वीर गैरीवाल्डी के जीवनचरित भी लिखे। इन दो विदेशी महापुरूषों ने लालाजी को अत्याधिक प्रभावित किया था।
जिस समय वे मराठा वीर छत्रपति शिवाजी का जीवनचरित लिख रहे थे उस समय तक इस महापुरूष के बारे में अधिक गहरा ऐतिहासिक अनुसंधान नहीं हुआ था। खाफी
सम्पादकीय 5
खां जैसे एकाध मुसलमान इतिहासकार द्वारा लिखे गये वृत्तान्त के अतिरिक्त
ने अपने प्रमुख ग्रन्थ उर्दू में लिखे हैं। कालान्तर में जब वे राजनीति के क्षेत्र में आये तो उन्हें अपने विचारों को व्यक्त करने के लिए अंग्रेजी का सहारा लेना पड़ा। वकालत जैसे व्यस्त व्यवसाय में आकण्ठ मग्न रहने पर भी लालाजी अध्ययन के लिए पर्याप्त समय निकाल लेते थे। महापुरूषों के जीवनचरितों को पढ़ना तथा उन पर मनन करना उनकी पहली प्राथमिकता थी। स्वदेश के इतिहास का अध्ययन भी उन्होंने गम्भीरता पूर्वक किया था और इस विषय से सम्बन्धित अनेक स्वदेशी एवं विदेशी लेखकों के ग्रन्थों को पढ़ा