उनकी राय हमारे लिए इसलिए लाभदायक है क्योंकि उन पर हमारे पक्षपाती होने का आरोप तो कदापि नहीं लग सकता। जो जाति अपने पतन के युग में भी राजा कर्ण, गोरा और बादल, महाराणा सांगा और प्रताप, जयमल और फत्ता, दुर्गादास और शिवाजी, गुरू अर्जुन, गुरू तेग बहादुर, गुरू गोविन्दसिंह और हरिसिंह नलवा जैसे हजारों शूरवीरों को उत्पन्न कर सकती है उस आर्य हिन्दू जाति को हम कायर कैसे मान लें? जिस देश को स्त्रियों ने आरम्भ से आज तक श्रेष्ठ उदाहरणों को प्रस्तुत किया है, जहां सैकड़ों स्त्रियों ने अपने हाथों से अपने भाइयों, पतियों और पुत्रों की कमर में शस्त्र बांधे और उनको युद्व में भेजा, जिस देश की अनेक स्त्रियों ने स्वयं पुरूषों का वेश धारण कर अपने धर्म व जाति की रक्षा के लिए युद्व क्षेत्र में लड़ कर सफलता पाई, अपनी आंखों से एक बंूद भी आंसू नहीं गिराया, जिन्होंने अपने पातिव्रत धर्म की रक्षा के लिए
उन्नति के इतिहास के अध्ययन के साथ साथ अवनति के इतिहास अत्यन्त शोचनीय रहा है। इस इतिहास को मुसलमानों ने लिखा जिसमें उन लेखकों का पक्षपात स्पष्ट दिखाई पड़ता है। इसमें लेखकों को दोष देना भी उचित नहीं है क्योंकि ये लेखक मुसलमानी दरबारों में रहते थे। बादशाहों को प्रसन्न रखना इनका कत्र्तव्य था और इस लेखन के बदले उन्हें भरपूर पारितोषिक मिलता था। इन इतिहासों में कदम कदम पर पक्षपात और आत्मप्रशंसा के चिन्ह दिखाई पड़ते हैं। ऐसे ग्रन्थों को लिखने के लिए बादशाहों के द्वारा लेखकों को मजबूर किया जाता था। इन ग्रन्थों में मुसलमानों की वीरता, हिम्मत