लिया जाये। इसके लिए चाहे छोटे छोटे राज्यों को नष्ट करना पड़े तो भी कोई हर्ज नहीं परन्तु दक्षिणी प्रान्त अवश्य हाथ आवे। अगर औरंगजेब से सुलह करके बीजापुर और गोलकुण्डा ठीक रहते तो इसमें सन्देह न था कि सम्पूर्ण दक्षिण नाम मात्र से ही औरंगजेब की राजधानी में शामिल हो जाता अथवा औरंगजेब ही सच्चे हृदय से बीजापुर और गोलकुण्डा से मेल करके शिवाजी को अपने बस में करने का यत्न करता तो भी शायद सफलता मिली होती। परन्तु उसे तो यह इच्छा रही कि ये तीनों शक्तियां क्षीण हो जायें और दक्षिण का सारा प्रदेश मुग़लराज्य में शामिल हो जाये। औरंगजेब इन शक्तियों को एक दूसरे से लड़ाने में ही अपनी सफलता देखता था, जिसका फल यह हुआ कि किसी
छत्रपति शिवाजी 111
को भी उसकी बात का विश्वास न रहा। ये तीन राजा एक तरफ औरंगजेब से लड़ते थे दूसरी तरफ आपस में भी झगड़ते रहते थे। इस झगड़े
के बादशाह से भी सन्धि हो गई। अब शिवाजी ने मुगलिया राज्य की ओर दृष्टि फेरी।
अध्याय 6
मुगलवंश का सामना
शिवाजी ने बीजापुर के बादशाह से छुट्टी पाकर मुगल राज्य से सामना करने का विचार किया। एक पुष्कल सेना एकत्र करके दो भाग किये। पैदल सेना का अध्यक्ष तो ’मोरपन्त’ को बनाया और घुड़सवार सेना की बागडोर ’नेताजी पालकर’ के हाथ में थमा दी और आज्ञा दी कि मुगलिया मण्डल को नष्ट भ्रष्ट करके अपना राज्य निष्कण्टक बनाने के लिए कार्य आरम्भ कर दो। फलस्वरूप् ’नेताजी’