में यदि चार शक्तियों में से किसी ने सफलता प्राप्त की तो वे शिवाजी ही थे। सन् 1673 ई. में बीजापुर का बादशाह आदिलशाह मारा गया। उसका पुत्र अभी 5 वर्ष का था। सबने मिल कर खवासखां को को प्रबन्धकत्र्ता बनाया परन्तु कुछ काल पीछे अब्दुलकरीम ने जो बीजापुर राज्य का एक मान्य पुरूष था और जिसने लोगों से मिलकर खवासखां को मरवा डाला था, स्वयम् उसका कार्यभार अपने ऊपर ले लिया। यह महाशय ’दिलेर खां’ मुग़ल सेनाध्यक्ष के सम्बन्धी थे, इसीलिए मुग़ल राजा से बिगाड़ना नहीं चाहता था। खवासखां इसलिये मारा गया क्योंकि उसने मुग़लों की अधीनता स्वीकार कर ली थी और आदिलशाह की पुत्री ’बादशाह बीवी’ को औरंगजेब के पुत्र के साथ ब्याह कर देने की प्रतिज्ञा कर ली थी। इसलिए अब्दुलकरीम इस समय विचित्र शिकंजे में फंसा हुआ था। भीतर से तो वह मुग़लों का शत्रु था परन्तु बाहरी दिखावे में दिलेरखां के कारण उससे


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औरंगाबाद तक लूट खसोट करके लौट आये और पूना में विश्राम किया। जब यह सब समाचार औरंगजेब को मिला तो क्रोधित होकर ’शायस्ता खां’ मुखिया को आज्ञा दी कि तत्काल एक महती फौज लेकर इस उजड्ड तथा धूर्त मरहठे की दुर्गति कर दे और उसके सम्पूर्ण मण्डल को ध्वस्त करके राज्य अपने अधिकार में कर ले और शिवाजी को कैद कर लाये। शायस्ता खां इस आज्ञा का पालन करने के लिए एक बड़ी भारी सेना के साथ रवाना हुआ और रास्ते में किलों को फतह करता हुआ पूना तक आ पहुंचा और यहां


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