बिगाड़ करने का साहस न होता था। उधर गोलकुण्डा में सन् 1670 ई. में कुतुबशाह के मर जाने के कारण प्रबन्ध मंे गड़बड़ी मच गई थी। उसका दामाद’ अबूहुसेन’ गद्दी पर बैठा था परन्तु वास्तविक बल और सारा अधिकार अन्यत्र था। शिवाजी ने अपने लिए यह अवसर अच्छा समझा और कर्नाटक के धावे की तैयारी शुरू कर दी।
यहां पर एक बात याद रखने योग्य है कि शिवाजी का एक छोटा भाई और था, जिस का नाम ’दुनकाजी’ था और वह अपने बाप की जागीर का मालिक बन बैठा था! शाहजी के जो विश्वासपात्र अधिकारी थे उनमें से ’रघुनाथ नारायण’ उसके पास रही करता था। रघुनाथ नारायण और ’दुनकाजी’ में परस्पर अनबन हो गई। कुछ समय तक तो वह गोलकुण्डा में अबूहुसेन के पास रहा और उसने मदनपन्त से सम्बन्ध पैदा कर लिया तत्पश्चात् शिवाजी के पास चला आया। उसका एक भाई जिसका नाम ’सोमन्त’ था शिवाजी के दरबार में एक प्रधान
से ’चाकन’ के किले पर आक्रमण कर दिया। ’फिरंगा निर्मला’ जो ’चाकन’ के किले का अध्यक्ष था अपने साथियों के साथ बड़ी वीरता से लड़़ता रहा। सम्पूर्ण सेना को लिऐ हुए शायस्ता खां 55 दिन तक किला घेरे अड़ा रहा। अन्त को 56 वें दिन जब किले की दीवार गोलियों के काण जर्जर और चलनी हो गई तो वीर मरहठे प्राणों की माया को छोड़ कर मुगलिया सेना पर टूट पड़े और दिन भर युद्व करते रहे। सूर्यास्त तक उन्होंने मुगल सेना को एक पांव भी आगे नहीं बढ़ने दिया। अन्त में सूर्यास्त के समय लड़ाई बन्द