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पद पर नियुक्त था। इसके अतिरिक्त शिवाजी को यह भी मालूम था कि उनके पिता ’शाहजी रघुनाथ नारायण का खूब सत्कार करते थे और वह उनके वंश के पुराने एंव विश्वासपात्र कर्मचारियों में से था। शिवाजी ने रघुनाथ नारायण का उचित सत्कार किया और उसे प्रधान की पदवी दी। इसी ने सब से पहले शिवाजी को कर्नाटक की ओर जाने की सम्मति दी। इस सम्मति से शिवाजी ने सब से पहले खानजहां को कुछ रूपया भेंट यिका और उससे प्रतिज्ञा कराई िकवह शिवाजी के राज्य में हस्तक्षेप नहीं करेगा। फिर उसने अपने राज्य का प्रबन्ध किया। चुने चुने कार्यकत्ताओं को अच्छे अच्छे स्थानों पर नियत करते सारा मण्डल मुरारपन्त के हवाले कर दिया। सन् 1671 ई. के आरम्भ में दक्षिण की ओर चल दिया।
जब हैदराबाद कुछ समीप आ गया तो ’मदनपन्त’ स्वयं शिवाजी की आगवानी के वास्ते आया और बड़े आदर सत्कार
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हो गई। प्रातःकाल मराठे दुर्गाध्यक्ष ने इतनी बड़ी सेना से सामना करना निष्फल जाकर किले को खाली कर दिया। मुगल सेनापति ने उन सब की बड़ी प्रशंसा की और दुर्गाध्यक्ष से बड़ी नम्रता के साथ मिला यहां तक की उनको सम्राट् की सेना में एक उच्च पद पर अधिकारी बनाया परन्तु वीर ’निर्मला’ ने यह पद स्वीकार न किया। यद्यपि औरंगजेब समझता था कि मरहठों को अपने अधीन करना कुछ बड़ी बात नहीं है परन्तु शायस्ता खां को इस लड़ाई से पता लग गया कि मरहठा लोगों