के साथ उनको अपनी राजधानी में ले आया। अन्त में शिवाजी और गोलकुण्डा के बादशाह में यह प्रतिज्ञा हुई कि कर्नाटक में जितनी ’शाहजी’ की जागीर है उसके अतिरिक्त जितनी भूमि शिवाजी के हाथ आये उसे गोलकुण्डा के बीच बराबर बांट दी जाय और यदि बीजापुर के दरबार से अब्दुलकरीम को निकाल कर उसके स्थान पर मदनपन्त के भाई को नियत कर दिया जाय तो उसको भी उसमें से हिस्सा दिया जाय। यदि विचार पूर्वक देखा जाय तो स्पष्ट ज्ञात होता है कि नियत कर दिया जाय तो उसको भी उसमें से ज्ञात होता है कि कर्नाटक वास्तव में बीजापुर का था। अपनी जागीर के अलावा न कुछ शिवाजी का था और न कुछ गोलकुण्डाधीश का । यह भी परस्पर प्रतिज्ञाएं की गई कि दूसरों के मुकाबले में शिवाजी और गोलकुण्डा अधीश एक दूसरे की सहायता करेंगे। इस प्रकार मुसलमानी गोलकुण्डा दरबार को दम दिलासा देकर शिवाजी मार्च मास में कृष्णा नदी के
को अधीन करना कुछ खेल नहीं है। अतएव वह लड़ाई से बचाव करने लगा। उधर औरंगजेब की तरफ से जोधपुर के महाराजा यशवन्तसिंह अपनी सेना के साथ तुरन्त शायस्ता खां की सहायता के लिए रवाना हुए। शाही सेना अपने वीर अध्यक्षों सहित कुछ काल तक चुपचाप पूना के सापने पड़ी रही परन्तु इतनी बड़ी सेना से भयभीत न होकर शिवाजी के दिलजले अफसर शत्रु की सेना तथा उसके मण्डल को नीचा दिखाने से पीछे नहीं हटते थें ’नेताजी पालकर’ भी अहमद नगर और औरंगाबाद के सामने आ