पार उतर गये। कुछ दिन तो तीर्थ यात्रा में बीते। तत्पश्चात् कर्नाटक पर चढ़ाई की। मई के प्रथम सप्ताह में मद्रास में जा निकले और गुंजी प्रान्त में पहंुचे जो उस समय बीजापुर के अधीन

छत्रपति शिवाजी 113

था। अमीर खां के पुत्रों ने जो उस राज्य के शासक थे स्वंय ही अपनी इलाका शिवाजी के हवाले कर दिया। शिवाजी ने वहां महाराष्ट्र का शासन और वही प्रबन्ध आदि जारी रखकर ’रवानी’ को हवालदार नियत कर दिया आगे बढ़ चले। बीजापुर के एक अधिकारी शेरखां ने पांच हजार सिपाहियों से उसका मुकाबला किया परन्तु परास्त होकर कैद हो गया। इस अवसर पर सेना के बाकी हिस्सों ने (जिनको शिवाजी पीछे छोड़ गये थे) ’दिलौर’ पर धावा कर दिया। यह घेरा 5 दिसम्बर तक रहा अन्त में किला हाथ आ गया। इधर शिवाजी ने पने भाई ’दुनकाजी’ से ’तरवाड़ी’ के स्थान पर मुलाकात की और यह अभिलाषा प्रकट की कि दोनों भाई बड़े उत्साह से मिल जायें।


206 of 229

डटा। उन्होंने शत्रु के मण्डल को लूटना तथा फूंकना आरम्भ किया जिससे मुगल सेना अत्यन्त क्षुब्ध हो उठी और एक समूह उन्हें दण्ड देने के लिए रवाना हुआ जिसका सामना करता हुआ ’नेताजी’ जख्मी हुआ पर हाथ न आया।

इसी बीच शायस्ता खां पूजा में आ गया और उस मकान में रहने लगा जो कि ’दादाजी कोंडदेव’ ने बनवाया था। वीर शायस्ता खां ने यह भी विचार न किया कि शिवाजी उन महावीरों में से है जिसके सामने अनादर और गुस्ताखी से पेश आना अन्त में अच्छा फल नहीं लाया करता । यद्यपि शायस्ता


206 of 378