शिवाजी अपने पिता शाहजी की जायदाद से आधा भाग मांगते थे परन्तु ’दुनकाजी’ नहीं देता था। निर्णय कुछ भी न हो सका, दुनकाजी तंजोर किले को लौट गया। शिवाजी की सेना विजय पर विजय प्राप्त करती गई। शिवाजी बराबर अपने भाई को कहते गये कि बहुत अच्छा हो यदि सन्धि कर ली जाये क्योंकि मैं भमि की इच्छा से यहां नहीं आया हूं परन्तु तो भी अपने पिता की जायदाद छोड़ना नहीं चाहता। इस अवसर पर ’दुनकाजी’ ने शिवाजी की एक न सुनी, फलस्वरूप शिवाजी ने शाहजी के सम्पूर्ण प्रान्तों पर अधिकार जमा लिया।

इधर शिवाजी विजय करने पर तुले हुए थे, उधर औरंगजेब ने सुना कि ’खानजहां’ ने शिवाजी से रूपया ले लिया है और शिवाजी ने गोलकुण्डा से मेल कर लिया है तो उसने खानजहां को वापस बुला लिया ओर दिलेर खां को आज्ञा दी कि अब्दुलकरीम बीजापुर के साथ मिल कर गोलकुण्डा पर धावा करे।

इस युद्व में


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खां ने बड़ी सावधानी से प्रबन्ध किया था कि शिवाजी किसी प्रकार भी नगर के भीतर घुसने न पावें परन्तु अन्त में यह बात सिद्व हो गई कि उसकी सभी तदबीरें, बुद्विमानी और विचारशीलता शिवाजी के सामने निष्फल हुई।

छत्रपति शिवाजी 71

औरंगजेब के सिपहसालार शायस्ता खां ने आज्ञा दी रखी थी कि कोई मरहठा बिना प्रमाणपत्र नगर के भीतर न आने पावे परन्तु शिवाजी ने अपनी चालाकी से प्रमाणपत्र प्राप्त कर किला और नगर में प्रवेश किया। शायस्ता खां की सेना के एक मरहठे सिपाही ने अपनी लड़की


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