मदनपन्त ने खूब वीरता से मुकाबला किया जिसका फल यह हुआ कि बीजापुर की सेना पराजित हो गई। इस पराजय के पश्चात् अब्दुलकरीम बीमार पड़ गया और जनवरी 1670 ई. में मर गया। दिलेर खां ने मसऊदखां को
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उसके स्थान पर नियत कर दिया। बदले में उसने दिलेरखां को बहुत सा रूपया देने की प्रतिज्ञा की और यह भी कहा कि वह कभी शिवाजी से सन्धि न करेगा अब्दुलकरीम के मरने के पश्चात् सेना का बहुत सा वेतन बाकी था। फलस्वरूप धीरे धीरे सेना घट चली।
जिस समय यह समाचार शिवाजी को मिला तो रघुनाथ नारायण और सेनापति ’भीमराव’ को कर्नाटक में छोड़ कर वापस चले आये। मार्ग में भी विजय पर विजय करते आये। कई किले उस समय उनके हाथ आये। जिस समय शिवाजी ’तुर्गल’ पहुंचे तो उन्हें मालूम हुआ कि कर्नाटक में ’दुनकाजी’ ने उनकी सेना पर धावा कर
के विवाह के बहाने शहर में बाजे गाजे के साथ जुलूस निकालने की आज्ञा दी। इस बारात में कुछ शस्त्रधारी भी थे। शिवाजी जो ’संगरह’ के किले से शाम को रवाना हुए थे रात को 25 मावलियों और अफसरों के साथ चुपचाप उस जुलूस में ( जो बाजार में चक्कर लगा रहा था) आकर शामिल हो गये। जब सब लोग सो गये तो शिवाजी और उनके साथियों ने जो ’दादाजी’ के मकान की ईंट-ईंट से परिचित थे कुल्हाड़ियां लेकर ’रसोई घर’ के ऊपर चढ़ गये जहां से उन्होंने अन्दर घुसने का मार्ग बनाया परन्तु