दिया है परन्तु बहुत कुछ हानि सह कर पीछे हट गया है। इस खबर को पाकर शिवाजी ने दुनकाजी को पत्र लिखा थ कि मुझे इन बहुमूल्य जातीय वीरों के नष्ट हो जाने का अत्यन्त कष्ट है जो इस प्रकार परस्पर के युद्व में मारे जा रहे हैं। हमें मेल करना चाहिए जिससे शत्रु पर विजय पा सकें। अन्त में इस चिट्ठी ने दुनकाजी का दिल पिघला दिया। दुनकाजी को यह भी विश्वास हो गया कि शिवाजी का मुकाबला करना व्यर्थ है। उसका भाग्य बढ़ा चढ़ा है। अन्त में पिता की धन सम्पत्ति और भूमि आदि में भाग देना भी स्वीकार कर लिया। इस प्रकार से विजयी शिवाजी 1 साल 6 माह के पश्चात् अपने रायगढ़ किले में जा पहुंचे।

उधर दुनकाजी से सन्धि हो जाने के कारण हेमराव भी वापस आया और समीप पहुंच कर उसने जनार्दनपन्त की सम्पत्ति से बीजापुर की सेना पर धावा कर दिया। इसमें शत्रु को अधिक हानि उठानी पड़ी। पांच सौ घोड़े,


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कुछ खटका होने से शायस्ता खां की स्त्रियां जग गई और कोलाहल मच गया। शायस्ता खां भी जाग पड़ा और एक खिड़की के रास्ते निकल कर भाग जाने की कोशिश में था कि शिवाजी ने उसके हाथ पर वार किया। फलस्वरूप उसकी एक अंगुली कट गई। शायस्ता खां तो किसी प्रकार बचकर भाग निकला परन्तु उसका लड़का ’अब्दुल फतेह खां’ और बहुत से सिपाही मारे गये। जब वे तीन या चार कोस की दूरी पर पहुंचे तब उन्होंने मशालें जलाई मानो वे शाही सेना को, जो सामने खड़ी थी, दिखला रहे हैं कि हम कैसी


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