पांच हाथी और शत्रु का सेनाध्यक्ष उनके हाथ आया। बेचारा बीजापुर न इधर का रहा न उधर का। मुग़ल सेना के भरोसे पर ही इसने शिवाजी से युद्व छेड़ा था। उधर मुसलमान मुग़ल सहायकों की यह दशा
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हुई कि जिस समय औरंगजेब को उस प्रबन्ध का समाचार मिला जो कि दिलेर खां ने मसऊदखां से किया था तो उसने इस प्रबन्ध को अस्वीकार कर दिया और दिलेर खां को आज्ञा दी कि बीजापुर की सेना को वेतन देकर उसको बस में कर ले और बीजापुर में राजकीय अधिकार जमा ले। अन्त को मसऊदखां शिवाजी से सहायता के लिए प्रार्थी हुआ। शिवाजी भी बहुत सी सेना लेकर आगे बढे़ इस धावे में शिवाजी ने दिल खोल कर मुग़लिया मण्डल को लूटा यहां तक कि लूटते लूटते गोदावरी पार तक चले गये। स्वयं सुलतान मुअज्जम भी जिसको अभी दक्षिण का सूबेदार नियत करके औरंगजेब ने भेजा था औरंगाबाद में विद्यमान
प्रसन्नता से बिना किसी चिन्ता-भय के मशालों की रोशनी में आनन्द लेते हुए अपना काम करके वापस जा रहे हैं।
शिवाजी का यह काम उनके जीवन के बड़े कारनामों में मुख्य गिना जाता है, और क्यों न हो, जब कि सारी शाही सेना सामना करने के लिए सुसज्जित हो और शिवाजी 25 मनुष्यों के साथ शायस्ता खां के महल में जा घुसे और मार काट करके
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बिना किसी प्रकार की हाानि के मशालों की रोशनी में गरजते हुए अपने किले में वापस आये। यह एक ऐसी करतूत है जो फुरती से