था। सूबेदार के रहते हुए भी शिवाजी की सेना ने तीन दिन निश्चित हो खूब लूट पाट की। यहां तक कि कोई मुसलमान स्थान न छोड़ा। शिवाजी के तमाम जीवन में यह पहला अवसर था कि जहां उन्होंने एक धार्मिक पुजारी को कष्ट दिया।
हम आगे चलकर मुसलमान इतिहासकारों की साक्षी से यह बात सिद्व करेंगे कि शिवाजी धार्मिक स्थानों को कितना पवित्र समझते थे। परन्तु तब भी शिवाजी के इस प्रकार के कामों से मुग़लों को बड़ा क्रोध पैदा हो गया और चारों ओर से मुग़ल सेना ने शिवाजी को घेर लियां शिवाजी का एक अफसर ’सैंदूजी’ मारा गया और सेना में खलबली मच गई परन्तु समय पड़ने पर धैर्य रखना शिवाजी ही जैसे वीर का काम था।
अत्यन्त साहस के साथ शिवाजी ने अपने प्राणों को संकट में डालकर चढ़ाई कर दी और शत्रु की सेना को दिखला दिया कि आवश्यकता पड़ने पर शिवाजी किस प्रकार से तलवार चला सकता है । बस
भरे हूए वीर के हिस्से में पड़ी है। प्रातःकाल होते ही मुगल सेना किले की ओर बढ़ी और जब बिल्कुल समीप पहुंच गई (जहां से कि तोपों के गोलों से भाग कर बचना सम्भव न था) तो उसने तोपें चलाना आरम्भ कर दीं। मरहठा सरदार,जो कि पहाड़ियों में छिपे हुए थे मुगल सेना पर टूट पड़े। अब मुगल सेना के पास भागने के सिवा कोई चारा न रहा। अब मुगल सेना के पास भागने के सिवा कोई चारा न रहा। आगे आगे मुगल सेना और पीछे पीछे मरहठा सरदारों की मार से मुगल सेना के बहुत से सिपाही मारे गये।