फिर क्या था मरहठे की तलवार बिजली के समान चमकने लगी और विकट युद्व छिड़ गया। मरहठे अपने सरदार को लेकर मुग़ल सेना के बीच होकर निकल गये परन्तु अभी दूर नहीं गये थे कि मुग़ल सेना ने एकत्रित होकर राजा किशनसिंह (जयसिंह का पोता) की आज्ञानुसार धावा कर दिया यहां तक कि शत्रुओं ने चारों तरफ से मरहठों को घेर लिया और शिवाजी का रास्ता बन्द कर दिया।
116 छत्रपति शिवाजी
जब शिवाजी ने देखा कि इतनी बड़ी सेना से पार पाना कठिन है तो वे एक गुप्तचर को साथ लेकर दूसरे रास्ते से निकल गये। जिस समय शिवाजी पटना में आये तब ’मसऊदखां’ का एक पत्र उन्हें मिला जिसमें लिखा हुआ था कि दिलेरखां किले की दीवारों के इतना समीप आ पहुंचा है कि यदि सहायता नहीं मिली तो सब काम बिगड़ जायेगा। शिवाजी पत्र को पढ़ते ही बीजापुर की तरफ रवाना हो गये। अभी थोड़ी ही दूर गये होंगे
जब शायस्ता खां को इस पराजय का समाचार मिला तो उसका दिल टूट गया और निरूत्साही हो यशवन्तसिंह को झूठी शिकायतें करने लगा। पहले तो औरंगजेब ने इन दोनों को वापस बुला लिया और उनके स्थान में अपने पुत्र ’मुअज्जम’ को रवाना किया। परन्तु फिर शायस्ता खां को बंगाल का शासन देकर यशवन्तसिंह को मरहठों के मुकाबिले के लिए भेजा परन्तु यशवन्तसिंह को भी पूरी सफलता न मिली कि वह शिवाजी को पहाड़ी किले से निकाल बाहर करता। अन्त में लाचार होकर अपनी सेना का कुछ भाग ’चाकन’