कि फिर समाचार मिला कि उनका बेटा सम्भाजी दिलेर खां से मिल गया है। यह सुनते ही शिवाजी ने भीमराव को तो बीजापुर की तरफ भेज दिया और आप सम्भाजी को लेने के लिए ’पनाला’ दुर्ग की तरफ रवाना हो गये। उधर दिलेर खां ने अपनी सेना का एक भाग सम्भाजी को देकर मरहठों का राजा बना दिया और उसे भूपालगढ़ पर धावा करने की आज्ञा दे दी जिसे सम्भाजी ने जाते ही फतेह किया। उधर हेमराव ने दिलेर खां को तंग करना शुरू कर दिया। किले के अन्दर वाले लोग भी धैर्य पूर्वक डटे रहे। हेमराव ने दिलेर खां को सामग्री पहुंचाने वाले सभी साधन नष्ट कर दिये और उसे तंग किया कि उसने लाचार होकर किले को छोड़ दिया और आस पास के प्रान्तों को लूटना शुरू कर दिया। दिलेर खां कृष्णा नदी पार करके कर्नाटक को उजाड़ने में लगा हुआ था कि उधर जर्नादन पन्त भी आ पहुंचा जिसने मौका पाकर दिलेर खां पर चढ़ाई कर दी और उसे परास्त करके ही छोड़ा।
और ’जूनर’ के किलों पर छोड़ कर शाही सेना का औरंगाबाद वापस आना पड़ा।
शिवाजी ने विचार किया कि कुछ धन एकत्रित करना चाहिए क्यांेकि लगातार संग्रामों और दौरों से उसकी सेना को माल हाथ लगने का कोई भी अवसर नहीं मिला था। इसलिए अपने साथियों में यह प्रसिद्व कर दिया कि मैं नासिक के मन्दिर में दर्शन करने के लिए जा रहा हूं परन्तू चुपचाप 4000 सवार लेकर जनवरी सन् 1664 ई. में ’सूरत’ पर चढ़ाई कर दी। सूरत उन दिनों खूब दौलत से भरा था। छः दिनों तक