बात का पता नहीं कि उनकी अन्तिम घड़ी समीप है। उनकी आत्मा अपना कार्य कर चुकी और उसको इस शरीर के त्यागने की इच्छा है। शिवाजी अपने राज्य प्रबन्ध में लगे हुए थे कि मार्च सन् 1680 ई. को अन्तिम दिनों में उनके घुटनों में सूजन पैदा हो गई। यहां तक कि ज्वर भी आना आरम्भ हो गया जिसके सबब से सात दिन में शिवाजी की आत्मा अपना नश्वर कलेवर छोड़ परम पद को प्राप्त हो गई।
15 अप्रैल सन् 1680 ई. को शिवाजी का देहावसान हो गया। यह यच है कि मृत्यु सबसे अधिक बलवान् है। वह मनुष्य जो लगभग 40 वर्षो तक भारतवर्ष के कई बादशाहों से वीरता पूर्वक लड़ा। जिसने लाखों मनुष्यों का मुकाबला किया, जिसने अपने साहस के सामने पर्वत, नाले, नदी, समुद्र चोटी व घाटी, जंगल, शेर, हाथी आदि को कुछ न समझा। वह आज क्षण भर में मृत्यु के कराल गाल में समा गया। बीमारी ने उन्हें सात
पर शिवाजी ने कुछ दिन तक राज्य का प्रबन्ध किया। इसी अवसर पर उन्होंने अपने लिए राजा की पदवी तजबीज की और अपने नाम का सिक्का चला दिया। इस प्रकार 20 वर्ष के भीतर एक यवन राज्य के जागीरदार के होनहार पुत्र ने केवल बुद्विमत्ता और ईश्वरप्रदत्त शक्ति एवं वीरता से अपने और जाति के शत्रुओं से लड़ भिड़ कर और मार काट करके एक हिन्दू राज्य की नींव डाली और अपने आपको पहला हिन्दू राजा बनाया।
औरंगजेब जैसा बलवान् सम्राट् बड़े बडे़ वीर राजपूतों के सहायक होने पर