छत्रपति शिवाजी 119

निर्दयी के राजत्व काल में उत्पन्न होकर आर्य जाति के गौरव को जीवित कर देना शिवाजी का ही काम था। वे अपने नौकरों और सम्बन्धियों से प्रेमपूर्वक बर्ताव करते थे। शिवाजी की मृत्यु के कुछ दिन पहले यह समाचार मिला था कि ’’दुनकाजी हतोत्साह होकर सम्पूर्ण कार्य छोड़ बैठा है और उसने वैराग्य धारण कर लिया है।’’ ऐसा समाचार पाकर शिवाजी ने एक पत्र लिखा था जिसका विषय इस प्रकार था-

प्यारे बन्धु-

बहुत दिन हुए तुम्हारा पत्र नहीं मिला, चित्त उदास है आज ’रघुपन्त’ के पत्र से ज्ञात हुआ कि तुम उदास हो और अपने शरीर की भी परवाह नहीं करते। तुम्हारी सेना सुस्त पड़ गई है परन्तु तुम्हंे कुछ परवाह नहीं। लोगों को सन्देह है कि तुम कहीं वैरागी न बना जाओ। मैं हैरान हूं कि तुम अपने पिता के सच्चे दृष्टान्त को क्यों भूल गये? जिरकाल तक उनके सााि रहे और उनकी संगति से


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बस उस तरह से ही तुरन्त तख़्ता ज़मीं थर्रायगा।।

जिस प्रकार ज्वालामुखी पर्वत मुद्दतों के विकारों का अपने भीतर लीन करके पुनः एक दिन अकस्मात् फूट पड़ता है, और अपनी भभक से आगा पीछा नहीं देखता। इसी प्रकार दक्षिण भारत के वीरों में जो विकार दीर्घकाल से भरा हुआ था वह शिवाजी का रूप धर कर फूट निकला। इसका फल यह हुआ कि जो मार्ग में आया झुलस गया और चारों ओर जहां भी शिवाजी ने हथियार उठाया, अपना सिक्का जमा दिया। शिवाजी ऐसे भोले न थे कि वे इस प्रसन्नता


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