लाभ उठाया। यह ध्यान देने की बात है कि पिताजी ने कैसी वीरता व गम्भीरता से कठिनाइयों का सामना करते हुए बड़े बड़े कार्य किये, ओर नाम पैदा किया, सदैव अपने आपको भंयकर आपत्तियों से बचाया। तुम को उनकी विद्वत्ता एवं गम्भीरता से लाभ उठाने की अनेक अवसर मिलते रहे। मुझ को भी जैसा अवसर मिला मैंने भी उनका यथाशक्ति अनुसरण कर लिया। यह वैरागीपन तुम्हें शोभा नहीं देता। आपने राज्य-कार्य तथा कोषादि ऐसे मनुष्य के हाथ में दे दिये हैं जो समय पड़ने पर सब को पचा जाय। क्या तुम को यह उचित है कि वैराग्य धारण करके अपनी शारीरिक अवस्था का सर्वनाश कर दो, यह कैसी विद्वत्ता है? इसका क्या फल होगा? मैं तुम से बड़ा हूं मेरी तरफ से तो कुछ न कुछ डर तुम्हें अवश्य होना चाहिए। अब उठो निद्रा त्यागो और वैरागी होने का विचार मन से भुला दो। अधीरता एवं
120 छत्रपति शिवाजी
शोक को
में यह भूल जाते कि उनकी जााति का एक कट्टर शत्रु औरंगजेब अभी तक उनकी ताक में लगा है और कदापि सम्भव नहीं कि वह शिवाजी को सुख से राज्य करने दे, तिस पर भी तुर्रा यह कि शिवाजी के एक अफसर ने कम्का जाने वाले मुसलमानों का जहाज लूट लिया और सम्पूर्ण यात्रियों से दण्ड के तौर पर पुष्कल धन लेकर छोड़ा। दिल्ली के बादशाह औरंगजेब को भी यह विचार न आया था कि कदाचित् कोई हिन्दू राजा भी मुसलमानों से दण्ड लेने की शक्ति रखता है। यह सुन कर कि एक बेअदब और धूर्त मरहठे