यह शिक्षा शिवाजी ने अत्यन्त शुद्व भाव एवं सच्चे दिल से दी थी। एक बार इनके बेटे ’सम्भाजी’ ने एक ब्राह्यण की लड़की के ऊपर कुदृष्टि डाली। जब यह खबर शिवाजी को मिली तो तत्काल उसे कैद कर लिया, एस पर पहरा बिठा दिया गया। इसी नाराजगी के कारण ’सम्भाजी’ दिलेरखां से जा मिला था। शत्रुओं की स्त्रियां जब कभी शिवाजी को मिलती थी तो उनके साथ शुद्व हृदय से पेश आते थे और आदर सहित उनको अपने घर भिजवा देते थे। शिवाजी कभी दूसरे मत से विरोध न करते थे। खानखां ने अपनी पुस्तक के दूसरे भाग पृष्ठ संख्या 110 में लिखा है कि शिवाजी का यह नियम था कि कोई मस्जिदों को हानि न पहुंचावे, औरतों को न छेड़े, और मुसलमानों के धर्म की हंसी न उड़ावे। शिवाजी को जब कभी कोई ’कुरान’ की पुस्तक मिल जाती थी तो किसी मुसलमान को दे देते थे। औरतों को अत्यन्त आदर की दृष्टि से देखते थे और उन्हें उनके रिश्तेदारों
को लूटा और फिर औरंगजेब के आसपास को निष्कण्टक किया। विजयपुर की सेना ने प्रतिज्ञा-पत्र को तोड़ कर ’कोंकण’ पर आक्रमण किया था। इसीलिए शिवाजी भी इस जोड़ तोड़ में बिजली के समान कभी यहां कभी वहां जा निकलते थे। अंगे्रज निरीक्षकों ने लिखा है कि शिवाजी की चेष्टाएं ऐसी चुस्त और तीक्ष्ण होती थीं जिसके कारण वे प्रत्येक स्थान पर दिखाई दिया करते थे। लोग समझते थे कि शिवाजी उत्तर दिशा को जा रहे हैं परन्तु फिर पता चलता िकवह तो दक्षिण में जा पहुंचे। आज एक स्थान, कल देसरे स्थान