छत्रपति शिवाजी 121
की शरण में पहुंचा देते थें लूट खसोट में गराबों और काश्तकारों की रक्षा करते थे। गो-ब्राह्यणों के लिए तो वे देवता स्वरूप थे। यद्यपि बहुत से लोग उनको लाालजी बताते हैं परन्तु उनके जीवन के कामों से विदित होता है कि वे जुल्म और अन्याय से धन कमा कर इकट्ठा करना अत्यन्त नीच काम समझते थे। शत्रु के धन को और राज्य को लूटने को वह अच्छा समझते थें एक बार दिलेर खां, शिवाजी के राज्य से बहुत सा माल और धन लूट कर ले चला था। जब शिवाजी को खबर मिली तो तत्काल उसका पीछा किया और धन वापस लाकर मालिकों को दे दिया।
शिवाजी की सफलता उनकी वीरता पर निर्भर थी। वे ऐसे बुद्विमान थे मानो जादू के पुतले हों। जो मनुष्य एक बार उनके हाथ आया वह कभी भी रूष्ट होकर नहीं गया। शत्रु की सेना से उनकी तरफ अनेक बार हिन्दू व मुसलमान आ मिले परन्तु शिवाजी की
में, परसों दूर एक तीसरे स्थान पर, सारांश यह कि वह ऐसी फुर्ती से काम करते थे कि शत्रु देख कर चकित हो जाते थे । वहे सदैव इसी विचार में रहते थे कि वह (शिवाजी) कोई मनुष्य है अथवा भूत-प्रेत। उनका समाचार प्रबन्ध (डाक विभाग) ऐसा पूर्ण और सच्चा था कि शिवाजी के पास शत्रु के घर के समाचारों का एक एक अक्षर ठीक ठीक और समय पर पहुंचाता था।
सामने मैदान में सारी शाही सेना पड़ी है, एक ओर विजयपुर की सेना धमकियां दे रही है। आपने यह प्रसिद्व कर दिया