सेना से सम्भाजी के अतिरिक्त और कोई शत्रु की सेना से नहीं मिला। शिवाजी अपने धर्म पर अत्यन्त दृढ़ रहते थे। रामायण और महाभारत आदि ऐतिहासिक तथा धार्मिक पुस्तकों के अवलोकन व श्रवण से उनको अधिक प्रेम था। कभी कभी मौका पाकर युद्व-स्थल से ही कथा श्रवण करने को चले जाते थे। जहां कहीं भी धर्म-चर्चा और मत-मतान्तरों पर शास्त्रार्थ का समाचार पाते थे वहां अवश्य पहुंचा करते थे। पूजा और नित्य कर्म में कभी फर्क नहीं पड़ता था।
पिछले पृष्ठों में शिवाजी का राज्य, शासन और उनकी वीरता और दिलेरी का वर्णन कर चुके हैं। पूर्व इसक कि शिवाजी के जीवन का संक्षिप्त इतिहास लिखना समाप्त करें, हम उचित समझते हैं कि उनके शासन का दिग्दर्शन करावें। जिससे यह मालूम हो जाय कि राज्य-प्रबन्ध में उनका मस्तिष्क और विचार-शक्ति किस कोटि की थी। शिवाजी केवल उच्च बुद्वि क वीर तथा सिपाही ही न थे वरन राजनीतिज्ञों और राजशासकों में भी अद्वितीय थे।
कि हम शाही सेना पर आक्रमण करेंगे और अगले दिन झट अपने समुद्री बेड़े में (जिसमें 85 छोटी छोटी नावें और तीन बड़़े जहाज थे) सवार होकर ’वार्सलीवर’ नगर में आ पहुंचे जो
76 छत्रपति शिवाजी
’गोवा’ से मील दूरी पर था और लूट मार के बाद 4000 मनुष्यों को साथ लेकर किनारे से बहुत दूर जा निकले। अब शत्रुओं को ज्ञात हुआ कि शिवाजी अपनी राजधानी में नहीं हैं। फिर क्या था, इधर उधर तलाश होने लगी। अभी दुश्मन पता भी न लगा सके थे कि मान्यवर महोदय बिजली