अध्याय 15
राज्य का प्रबन्ध
शिवाजी ने राज्य के प्रबन्ध के लिए एक राजसभा बना रक्खी थी जिसके आठ सभासद थे, जिनका नाम ’अष्टप्रधान’ था आठ विभागों के उत्तम-उत्तम कार्यकत्र्ता उसके सभासद थे-
(1) पेशवाजी- राजमन्त्री थे और राजा के बाद रियासत के सब से पहले पद पर नियुक्त थे। इनका दर्जा दरबार में राजसिंहासन के नीचे दाहिने ओर अव्वल जगह पर रहता था।
(2) सेनापति- अर्थात् सिपहसालार, सेना का उत्तम ओहदेदार था और दरबार में बाई ओर दूसरे नम्बर पर बैठता था यह स्थान गवर्नमेंट आफ इण्डिया के कमाण्डर इन चीफ की जगह के समान थी।
(3) अस्त्यानपन्त कोषाध्यक्ष- जो महामन्त्री से नीचे बैठता था।
(4) सचवानपन्त एकाउण्टेण्ट- अर्थात् कोष निरीक्षक या मनसबे आला जो तीसरे नम्बर में बैठता था।
(5) मन्त्री - जो राजा का प्रायवेट सेक्रेटरी था।
(6) सामन्त- जो फोरन सेक्रेटरी का दर्जा था, सेनापति के नीचे बाई ओर बैठता था।
के समान कड़कते हुए अपने स्थान पर आ विराजे और अपनी सेना को कई भागों में विभक्त कर शत्रुओं की भूमि का धावा कर दिया। यहां तक कि कई एक धनाढय व्यापारियों तथा नगरों को लूट कर अपने रायगढ़ किले में आ विराजे।
शिवाजी की इस कार्य-शैली के विषय में इतिहास लिखने वालों की कुछ भी सम्मति क्यों न हो परन्तु इसमें सन्देह नहीं कि इतनी कठिनता में भी जिस शीघ्रता और चालाकी से शिवाजी ने युद्व किया वह अपूर्व बुद्विमत्ता और वीरता की साक्षी देता है। इतिहास में इस प्रकार की होशियारी