फौजदारी का कार्य सूबेदार किया करते थे। हिसाब किताब सर्वथा स्वच्छ और उत्तम था। वर्ष के अन्त में जांच हुआ करती थी हिसाब जोड़ लगाकर बाकी निकाली जाती थी। जो धन राज्य की तरफ निकलता था तत्काल चुका दिया जाता था।

पैदल सेना में दस सिपाहियों में एक नायक नियत था

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और 15 नायकों पर एक हवलदार। दो हवलदारों पर एक ’सहास्तक’ नामक अध्यक्ष तथा सात अध्यक्षों पर एक जमादार था। 10 जमादारों पर एक अधिकारी नियत था। ये अधिकारी दो प्रकार के होते थे- (1) जागीरदार (2) सतजिलेदार। एक के पास राज्य की तरफ से घोड़ा और दूसरे के पास अपना घोड़ा रहता था। प्रत्येक ऊंचे सेनाध्यक्षों के पास एक क्लर्क (लेखक) रहता था। प्रत्येक को मासिक वेतन नगद दिया जाता था। शिक्षा के लिए मन्दिरों तथा पाठशालाओं और पण्डितों के नाम जागीर रहा करती थी। जिस समय शिवाजी


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का प्रत्यक्ष सबूत दिखाने के लिए हिन्दुओं को दबाने और उठते हुए राज्य का गला दबाने आया है। यद्यपि इस पिछले विचार से वह जाति का शत्रु और घातक है परन्तु इसके मारे जाने पर भी औरंगजेब की विजय है। इन निर्बल कर देने वाले विचारों ने वीर मरहठा को, जिसकी नसों में राजपूती रक्त किसी कदर बदल चुका था, चिन्ता में डाल दिया। उसकी चिन्ता में डाल दिया और सम्पूर्ण सेना के मुख मण्डल को भी ढीला कर दिया और सम्पूर्ण सेना के मुख मण्डल में उदासीनता छा गई। अन्त में शिवाजी ने सोचा


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