का जन्म हुआ था उस समय दक्षिण में संस्कृत का प्रचार कम था परन्तु शिवाजी के उत्साह एवं पुरूषार्थ से संस्कृत का प्रचार अधिक बढ़ गया था। शिवाजी के समय में दशहरा का उत्सव बड़ी उत्तमता से मनाया जाता था। इस समय पर प्रत्येक सिपाही की सम्पत्ति की सूची बनाई जाती थी। यदि किसी में कुछ कमी हो जाती थी तो दरबार से पूरी की जाती थी। यदि किसी में कुछ कमी हो जाती थी तो दरबार से पूरी की जाती थी। परन्तु लूट-पाट का धन किसी को नहीं मिलता था, सब खजाने में जमा होता था। शिवाजी का गुप्त प्रबन्ध अत्यन्त उत्तम था। उन्हें प्रत्येक स्थान के समाचार सब से पहले मिल जाया करते थे जो सच्चे हुआ करते थे। शत्रु के सेनासम्बन्धी समाचार पूर्णरूप से मिला करते थे जो क्षण-क्षण का समाचार देते थे। इस बात से सम्पूर्ण इतिहासकार सहमत हैं कि शिवाजी के प्रबन्ध में किसी प्रकार की घूस (रिश्वत) आदि नहीं ली जाती थी क्यांेकि शिवाजी स्वयं न्यायी एवं विचारशील पुरूष थे।
कि तलवार के बदले किसी अन्य ढंग से काम लेना चाहिए इसलिए शिवाजी ने सन्धि की चर्चा शुरू कर दी।
रायगढ़ के पास शिवाजी ने जयसिंह से सन्धि करने के लिए प्रस्ताव भेजा और उधर ’पूर्णधर’ किले में वीर मरहठे दिलेरखां और उसके वीर पठानों को जान लड़ाने की शिक्षा दे रहे हैं। उस मरहठा अफसर का नाम (जो किलेदार भी था) ’बाजी प्रभु’ था। उसके अधीन मरहठा सेना ने बड़ी उत्तमता से इस बात को सिद्व कर दिया कि रणभूमि से भाग कर प्राण रक्षा करने या संग्राम से घबड़ा भाग