छत्रपति शिवाजी
मूल लेखक
लाला लाजपतराय
सम्पादक तथा भाषा-परिष्कारक
डाॅ. भवानीलाल भारतीय
विजयकुमार गोविन्दराम हासानन्द
सम्पादकीय
लाला लाजपतराय अपने युग के महान देशभक्त, राष्ट्रनेता तथा स्वतन्त्रता सेनानी तो थे ही, वे एक सिद्वहस्त लेखक तथा साहित्यकार भी थे। उर्दू और अंगे्रजी उनकी विचाराभिव्यक्ति की प्रमुख भाषाएं थीं। वे पंजाब में जन्में और वहीं उनका प्रमुख कार्यक्षेत्र रहा। इस प्रान्त में उर्दू का प्रचलन मुसलमानी शासन से लेकर अंग्रेजी हकूमत तक रहा। लालाजी ने अपने प्रमुख ग्रन्थ उर्दू में लिखे हैं। कालान्तर में जब वे राजनीति के क्षेत्र में आये तो उन्हें अपने विचारों को व्यक्त करने के लिए अंग्रेजी का सहारा लेना पड़ा। वकालत जैसे व्यस्त व्यवसाय में आकण्ठ मग्न रहने पर भी लालाजी अध्ययन के लिए पर्याप्त समय निकाल लेते थे। महापुरूषों के जीवनचरितों को पढ़ना तथा उन पर मनन करना
स्वप्न मात्र से घबड़ाकर एक मिथ्या विश्वास से निर्बल होकर सहज ही शत्रु के हवाले कर दिया। यह सच है कि इसी प्रकार के
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मिथ्या विश्वासों का यह फल था कि एक वीर से वीर और जान से खेल जाने वाली एवम् आत्मा को नित्य मानने वाली भारत सन्तान इस्लामी झण्डे का मुकाबला न कर सकी और थोडे़ ही समय में दासता की जंजीर पहिन अपने शुभ गौरव, विद्या बुद्वि एवं मान सत्कार को तिलाज्जलि दे बैठी। इन्हीं मिथ्या विश्वासों ने आर्यावर्त को कई बार पहले भी धोखा देकर नष्ट किया।