विदेशी आक्रमणकारी, हिन्दुओं की स्वतन्त्रता को छीनने वाला शहाबुद्दीन गौरी था। दिल्ली के सिंहासन पर अपना अधिकार जमाने वाला पहला मुसलमान बादशाह कुतबुद्दीन एबक था जो गुलाम वंश का था, जिस का कार्यकाल 1205 या 1206 ई. माना जा सकता है।
बारहवीं से सोलहवीं शताब्दी, अथवा यों कहें कि सम्राट् अकबर के शासन काल तक इस देश में अनेक स्वतन्त्र हिन्दू नरेश थे। भारत के मानचित्र पर हम दृष्टिपात करें तो इसमें आपको राजपुताना का विशाल क्षेत्र दिखाई देगा। मूलतः यह उतना छोटा नहीं था जितना आज है। वस्तुतः एस समय का यह राजस्थान बहुत बड़ा था। 1395 में दिल्ली के सिंहासन पर बैठने वाला अलाउद्दीन खिलजी प्रथम व्यक्ति था जिसने राजपुताना पर चढ़ाई की 14 वीं शताब्दी के आरम्भ में उसने चित्तौड़ पर चढ़ाई की किन्तू कुछ समय बाद यह प्रदेश पुनः स्वतंत्र हो गया। उसके बाद इस पर हमलाा करने वाला
12 छत्रपति शिवाजी
के द्वारा लिखी गई पुस्तकों के अलावा हमारे पास कोई दूसरी साम्रगी नहीं है। मुसलमानी इतिहासों में हमें तथा हमारी जाति को कायर सिद्व किया गया है तथा हम पर बेइमानी तथा दगाबाज़ी के लांछन लगाये गये हैं। ये लांछन तो कायरता से भी बढ़कर हैं। कुछ यूरोपियन विद्वानों ने सच्चाई को खोलकर लिखा है और हिन्दुओं की वीरता और गम्भीरता की प्रशंसा भी की है किन्तू कुछ अन्य यूरोपीयन विद्वानों ने मुसलमान लेखकों की हां में हां मिलाई है। ग्रान्ट डफ एक प्रसिद्व इतिहासकार हैं जिन्होंने